Tuesday, September 18, 2012

और जहां से बेशक तोड़ के रखते हैं
आंसू बीते कल से जोड़ के रखते हैं

तुम भी इस क़िस्से का हिस्सा हो जाना
हम कुछ सतरें खाली छोड़ के रखते हैं

मंजिल की चाहत तो ख़ाम-ख़याली है
सफ़र के आशिक़  छाले फोड़ के रखते हैं

आज के दिन तुम बिलकुल याद नहीं आये
डायरी का ये पन्ना मोड़ के रखते हैं

साथ गुज़ारा वक़्त बिछाकर रखा है
तेरी सारी यादें ओढ़ के रखते हैं

Friday, August 31, 2012

ठीक है इलज़ाम जो उसपे धरा है
दौर है ये खोट का और वो खरा है

यूँ न समझो एक तुम पर ही टिकी है
ज़िन्दगी  को मौत का भी आसरा है

हमको ये अफ़सोस मरहम कर न पाए
ज़ख्म को ये नाज़ के अबतक हरा है

उसने पूरे दाम देकर ली रिहाई
पहले तडपा, छटपटाया फिर मरा है

थम गयी उल्फत की बारिश हाँ मगर अब
दिल-गली में याद का पानी भरा है

Friday, August 24, 2012

बात से, बैठक से, धरने से क्या होता है
बस इक मेरे ही करने से क्या होता है

खून का प्यासा होता है ये इश्क़ का बूटा
आँखों के आंसू गिरने से क्या होता है

बात तो तब थी सारा बेडा पार उतरता
इक खाली कश्ती तरने से क्या होता है

मैंने कितनी बातें तय करके रखीं है
लेकिन मेरे तय करने से क्या होता है

मैं उसकी नज़रों को जीते-जी ना भाया
अब उसपे मेरे मरने से क्या होता है

मेरे बुज़दिल होंठों से वो आँखें बोलीं
चुप-चुपके आहें भरने से क्या होता है

लिखो ऐसी बात की सारी दुनिया जागे
यूँ पन्ने काले करने से क्या होता है

Tuesday, July 31, 2012

वो  गर बनना संवरना जानता है
मेरा  दिल आह  भरना जानता है
 
अँधेरे को लगे  एक सब एक जैसा
उजाला फ़र्क़ करना जानता है

वही जिंदा है इस झूठे जहां में
जो सच्चाई पे मरना जानता है

है फितरत वक़्त की मरहम के जैसी
यह गहरे  ज़ख्म भरना जानता है

सयाना हो गया काजल की अब वो
 संवरना कब बिखरना जानता है




Monday, June 25, 2012

इक पतंगा रिझाए रखा है
दिल दिए सा जलाए रखा है

रौशनी जिसकी ऐब गिनती थी
इक दिया था! बुझाए रखा है

दिल की अलमारी में सलीक़े से
याद तो तह लगाए रखा है

तेरे ज़ख्मों को जान-ए-जां हमने
मरहमों से बचाए रखा है

भूलना तुझको मेरे बस में कहाँ
तुझको दिल में छुपाये रखा है

Friday, May 18, 2012

सीने में इक आग लगाए रखते हैं
मुझको मेरे ख़्वाब जगाये रखते हैं
 
जीने की ये कोशिश हमको मार न डाले
हम दिल के अरमान दबाये रखते हैं
 
मुफलिस को आराम नहीं है उसको अक्सर
आटा, चावल, दाल भगाए रखते हैं
 
हाँ! हम उनसे ख़्वाबों में ही मिलते हैं पर
उन से  यूँ पहचान  बनाए रखते हैं
 
उसका लौट के आना नामुमकिन है लेकिन
हम  फिर भी घर-बार सजाये रखते हैं

Wednesday, May 2, 2012

सच यहाँ बीती कहानी हो गया

सच यहाँ बीती कहानी हो गया
झूठ सबका यार-ए-जानी हो गया
 
हुस्न तेरा शाम की चादर तले
चम्पई से धानी- धानी हो गया
 
हम जहाँ मिलते थे जानां  वो शजर
गुमशुदा कोई निशानी हो गया
 
मेरा बेटा फ़र्ज़ के सहराओं में
हू-ब-हू मेरी जवानी हो गया
 
एक आंसू वक़्त की देहलीज़ पर
जैसे दरिया की रवानी हो गया
 
मैं जो प्यासा लौट आया हूँ विशाल
इक समंदर पानी पानी हो गया