Monday, May 6, 2013

उनकी आँखों का तीर हो जाऊं
दर्दमंदों का पीर हो जाऊं

मेरे पिंजरे को तोड़ने वाले
क्या मैं तेरा असीर हो जाऊं?

न लियाक़त है ना हुनर कोई
सोचता हूँ वज़ीर हो जाऊं

दौलतें दे जहान को; मुझको
ऐसा कुछ दे फ़क़ीर हो जाऊं

 

15 comments:

  1. खुबसूरत अभिव्यक्ति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार ७/५ १३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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    1. Hausla badhaane ke liye aabhaar!!
      Vishal

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  3. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 10-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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    1. Hausla badhaane ke liye aabhaar!!
      Vishal

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  4. बहुत खूब ... फ़कीर हो जाना ही जीवन है ..

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  5. हुमा को तलाशे हैं महलो-महल्ले..,
    वो सरताज हो तो कोई शहरयार हो.....

    हुमा = " एक ऐसा परिंदा जिसके बारे में मान्यता है कि यह
    जिसके सिर पर बैठ जाए वह बादशाह बन जाता है"

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  6. बहुत सुंदर रचना
    शुभकामनाएं

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  7. bahut badhiya...kuchh aisa de ki fakir ho jaaun !

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  8. न लियाक़त है ना हुनर कोई
    सोचता हूँ वज़ीर हो जाऊं
    कोई दिक्कत नहीं आज बहुत बैठे हैं सरकार में ऐसे,जरूरत तो बस किसी गोड फादर की ही है.सुन्दर कविता

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  9. कुछ ऐसा दे
    कि फ़कीर हो जाऊँ ||
    सुन्दर

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  10. Sakhi--- gud one

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