Saturday, April 28, 2012

सुबह होने में देर हो शायद!!

रात तो ढल चुकी है हाँ लेकिन
सुबह होने में देर हो शायद

जागते हैं अभी क़लम-कागज़
मुझको सोने में देर हो शायद

कुछ ख़यालों में है झिझक बाक़ी
शेर होने में देर हो शायद

और कितने ही काम बाक़ी हैं
ज़ख्म धोने में देर हो शायद

वो दिलासा सभी को देता है
उसको रोने में देर हो शायद

मुझको दुनिया से भी निभानी है
तेरा होने में देर हो शायद

3 comments:

  1. वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. Aadarniya Dr. Sahab
    Aapke hausla badhane ke liye bohot dhanyawad.
    Vishal

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  3. वो दिलासा सभी को देता है
    उसको रोने में देर हो शायद.

    बहुत खूब.

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