Friday, August 30, 2013

  नाम की तख्ती को अब दुनिया ऐसे भी चमकाती है
नज़रों में आने की ख़ातिर नज़रों से गिर जाती है

 जिस चाहत के दम पे तूने जां फूंकी इस  मुर्दे में
हैरत है वो चाहत तुझपे मरने को उकसाती है

तू क्या जाने तुझ तक आना कितना मुश्किल होता है
तुझ तक आती रह भी तेरे रस्ते भटकाती है

 झूठ भी बोले, चोरी कर ली खुद को तिल-तिल बेचा भी
देखें दुनिया, दुनियादारी में अब क्या करवाती है

जिस चाहत ने मेरे अंदर की चाहत को  मार दिया
अब वो चाहत मुझसे चाहत के क़िस्से लिखवाती है

Monday, July 1, 2013

है दौर जवानी का ऐसा, दिन- रात से ख़ुशबू आती है
हो जाए इसमें इश्क भी तो , हर बात से ख़ुशबू आती है

मैं उससे मिला हूँ जिस दिन से, एहबाब ये कहते हैं मेरी
इस बात से ख़ुशबू आती है, उस बात से ख़ुशबू आती है

देखा कंक्रीट को भीगते जो, बादल ने कहा मायूसी से
मिट्टी  के मकां पे गिरती हुई, बरसात से ख़ुशबू आती है

वो फूल जो दफन किताबों में, वो ख़त जो सहेली लाती थी
नाकाम मुहब्बत की इक-इक, सौगात से ख़ुशबू आती है!!

Thursday, June 13, 2013

इस जहां में अब येही दस्तूर होना चाहिए
सच के हाथों  झूठ को मजबूर होना चाहिए

तू जिसे मिल जाए उसकी पारसाई क़ुफ़्र है
उसको चाहत के नशे में चूर होना चाहिए

पास इतने हो की घुलते जा रहे हो मुझमें तुम
हम को इक-दूजे से थोडा दूर होना चाहिए

जिसने दिल में पाल रखा हो मुहब्बत का चिराग़
उसके चेहरे पे बला का नूर होना चाहिए

झुक के चलने में यहाँ दब जाने के आसार हैं
एहतियातन आपको मग़रूर होना चाहिए





Friday, June 7, 2013

तेरी आँखें मुझे बहका रहीं हैं
मुहब्बत करने को उकसा रहीं हैं

उजाला ख़ुद अंधेरों का है ख़ालिक़
मुझे परछाईयाँ बतला रहीं हैं

मुझे देखा जो महफ़िल में तभी से
मेरी तन्हाइयां पछता रहीं हैं

यही मौक़ा है आओ ख़्वाब देखें
अभी नींदें ज़रा सुस्ता रहीं हैं


Thursday, May 16, 2013

उसको डर भगवान नहीं है
वो जो ख़ुद इंसान नहीं है

मुझ में से वो यूँ निकली है
जैसे मेरी जान नहीं है

सबकी नज़रों से गिर जाना
इतना भी आसान नहीं है

दिल के बदले में दिल दे दे
वो इतना नादान नहीं है

हैरत है  तन्हाई में भी
दिल की गली सुनसान नहीं है

मुझ पर भी इक राज़ खुला है
वो मुझसे अनजान नहीं है

Monday, May 6, 2013

उनकी आँखों का तीर हो जाऊं
दर्दमंदों का पीर हो जाऊं

मेरे पिंजरे को तोड़ने वाले
क्या मैं तेरा असीर हो जाऊं?

न लियाक़त है ना हुनर कोई
सोचता हूँ वज़ीर हो जाऊं

दौलतें दे जहान को; मुझको
ऐसा कुछ दे फ़क़ीर हो जाऊं

 

Wednesday, April 3, 2013

दुनिया में जितने दिल टूटे, मेरे तुम्हारे दिल हैं
युं हर आशिक़ के क़िस्से में हम थोड़े से शामिल हैं

मेरी सोच में इससे बढ़ कर और सज़ा  ना होगी
उम्र मेरी उनको लग जाए जो मेरे क़ातिल हैं

शेर' हमारे और ये ग़ज़लें पर्दा हैं ऐबों का
हम क्या हैं ये उनसे पूछो हम जिनको हासिल हैं

उसके बिछड़ने का पछतावा छोड के अब सोचेंगे
हम जिनके हिस्से में आये क्या उनके क़ाबिल हैं?