Monday, January 7, 2013

मुझे तुम और मुश्किल में न डालो
मेरे चेहरे से ये नज़रें हटा लो

अगर ज़ालिम का कुछ न कर सको तो
कम-अज़-कम आसमां  सर पे उठा लो

ख़बर में तुम नहीं कितने दिनों से
दबा-कुचला कोई मुदआ उछालो

चलो हम पैर रखते हैं दोबारा
चलो जल्दी से तुम आँखें बिछा लो

ये बरसों की मुहब्बत का सिला हैं
लो! मेरी आँख के आंसू संभालो

Thursday, December 20, 2012

वफ़ा लिख चुके हैं, जफ़ा लिख चुके हैं
मुहब्बत पे कितनी दफ़ा लिख चुके हैं

सियासत हुई नाज़बरदार उनकी
जिन्हें सारे मुनसिफ सज़ा लिख चुके हैं

तुम्हे ज़िद है बीमार रहने की हम तो
दुआ कर चुके हैं, दवा लिख चुके हैं

तू रहने दे क़ासिद न बातों से बहला
वो चाहत को मेरी ख़ता लिख चुके हैं

मुहब्बत में तेरी, तू माने न माने
तुझे बेख़बर हम खुदा लिख चुके हैं

Monday, December 17, 2012


मेरा जो ये ख़्वाब है, छीनो!
आँखों को तेज़ाब है, छीनो
जो सीधे से ना मिलता हो
सीधा एक हिसाब है, छीनो
सांस गले की फांस हुई है
अब मेरी फ़रियाद है, छीनों
पुरखों की सब दौलत- शोहरत
मुझको एक अज़ाब है छीनो
मांगे से ये कब मिलती है
सरकारी इमदाद है, छीनो

Friday, November 23, 2012

ख़्वाबों की  ताबीर सोचता रहता हूँ
मैं आँखों से नींद पोंछता रहता हूँ

ज़ालिम और मज़लूम का क़िस्सा लिखने को
मैं ख़ुद अपना मांस नोचता रहता हूँ

मैंने जिस पल तुझको भूलना चाहा था
अब अक्सर उस पल को कोसता रहता हूँ

जिसने मेरे शेर पढ़े अखबारों में
वो क्या जाने मैं क्या सोचता रहता हूँ

 आँखें ही उजियाला हैं समझाने को
मैं सूरज की और देखता रहता हूँ

Monday, November 5, 2012

जहाँ देखो वहां आता नज़र है
तो मुमकिन है ख़ुदा भी दर-ब-दर है

अज़ाबों में यहाँ हर  बा-ख़बर है
मज़े में है वही  जो बे-ख़बर है

उठा लें तेग़ ग़ालिब, ज़ौक-ओ-मोमिन
हुआ शाइर बहादुर शाह ज़फ़र है

यक़ीनन  कोई  तुमको चाहता है
हसीं होना मुहब्बत का असर है

बिखेरा उसने हर इक रंग लेकिन
वही दिखता है जो रंग-ए -नज़र है 

Monday, October 29, 2012

यहाँ जज़्बात-ओ-एहसासात को अश`आर करने में
बहाया  खून आँखों ने ग़ज़ल से प्यार  करने में
मेरे चेहरे की झुर्रियों को ज़रा तुम गौर  से देखो
लगे हैं उम्र को बरसों मेरा सिंगार करने में
निहत्था उसने भेजा ही नहीं तुमको ज़रा सोचो
लगे है देर कितनी हाथ को हथियार करने में
बहाए तूने ख़त मेरे जला दीं मैंने तसवीरें
लगे हैं हम मुहब्बत के निशाँ मिस्मार करने मे
मिले हैं रात के सीने में कितने तीर किरणों के
हुआ इक ख्वाब खुद चुरा मुझे बेदार करने में
तेरी तस्वीर, तेरे ख़त ये सब अपनी जगह लेकिन
मज़ा कुछ और है ज़ालिम तेरा दीदार करने में
  
हवा, पानी शहर के और जड़ों से टूटना मेरा
यक़ीनन  हाथ है इनका मुझे बीमार करने में
मुहब्बत एक-तरफ़ा भी मुक़म्मल शै है जानेमन
गंवाएं वक़्त क्यों इज़हार या इक़रार  करने में

Wednesday, October 10, 2012

लोगों की आँखों में खटकने वाले हैं
अब हम उसके दिल में धड़कने वाले हैं

उसके हुस्न का रंग निखर कर आएगा
अब हम  उसपे जान छिड़कने वाले हैं

मंजिल भी मायूस न कर दे इस डर से
 हम थोड़ा सा और भटकने वाले हैं

ख़्वाब में देखा बाजू का कट कर गिरना
यअनी वो पहलू से सरकने वाले हैं