Friday, August 24, 2012

बात से, बैठक से, धरने से क्या होता है
बस इक मेरे ही करने से क्या होता है

खून का प्यासा होता है ये इश्क़ का बूटा
आँखों के आंसू गिरने से क्या होता है

बात तो तब थी सारा बेडा पार उतरता
इक खाली कश्ती तरने से क्या होता है

मैंने कितनी बातें तय करके रखीं है
लेकिन मेरे तय करने से क्या होता है

मैं उसकी नज़रों को जीते-जी ना भाया
अब उसपे मेरे मरने से क्या होता है

मेरे बुज़दिल होंठों से वो आँखें बोलीं
चुप-चुपके आहें भरने से क्या होता है

लिखो ऐसी बात की सारी दुनिया जागे
यूँ पन्ने काले करने से क्या होता है

Tuesday, July 31, 2012

वो  गर बनना संवरना जानता है
मेरा  दिल आह  भरना जानता है
 
अँधेरे को लगे  एक सब एक जैसा
उजाला फ़र्क़ करना जानता है

वही जिंदा है इस झूठे जहां में
जो सच्चाई पे मरना जानता है

है फितरत वक़्त की मरहम के जैसी
यह गहरे  ज़ख्म भरना जानता है

सयाना हो गया काजल की अब वो
 संवरना कब बिखरना जानता है




Monday, June 25, 2012

इक पतंगा रिझाए रखा है
दिल दिए सा जलाए रखा है

रौशनी जिसकी ऐब गिनती थी
इक दिया था! बुझाए रखा है

दिल की अलमारी में सलीक़े से
याद तो तह लगाए रखा है

तेरे ज़ख्मों को जान-ए-जां हमने
मरहमों से बचाए रखा है

भूलना तुझको मेरे बस में कहाँ
तुझको दिल में छुपाये रखा है

Friday, May 18, 2012

सीने में इक आग लगाए रखते हैं
मुझको मेरे ख़्वाब जगाये रखते हैं
 
जीने की ये कोशिश हमको मार न डाले
हम दिल के अरमान दबाये रखते हैं
 
मुफलिस को आराम नहीं है उसको अक्सर
आटा, चावल, दाल भगाए रखते हैं
 
हाँ! हम उनसे ख़्वाबों में ही मिलते हैं पर
उन से  यूँ पहचान  बनाए रखते हैं
 
उसका लौट के आना नामुमकिन है लेकिन
हम  फिर भी घर-बार सजाये रखते हैं

Wednesday, May 2, 2012

सच यहाँ बीती कहानी हो गया

सच यहाँ बीती कहानी हो गया
झूठ सबका यार-ए-जानी हो गया
 
हुस्न तेरा शाम की चादर तले
चम्पई से धानी- धानी हो गया
 
हम जहाँ मिलते थे जानां  वो शजर
गुमशुदा कोई निशानी हो गया
 
मेरा बेटा फ़र्ज़ के सहराओं में
हू-ब-हू मेरी जवानी हो गया
 
एक आंसू वक़्त की देहलीज़ पर
जैसे दरिया की रवानी हो गया
 
मैं जो प्यासा लौट आया हूँ विशाल
इक समंदर पानी पानी हो गया
 

Saturday, April 28, 2012

सुबह होने में देर हो शायद!!

रात तो ढल चुकी है हाँ लेकिन
सुबह होने में देर हो शायद

जागते हैं अभी क़लम-कागज़
मुझको सोने में देर हो शायद

कुछ ख़यालों में है झिझक बाक़ी
शेर होने में देर हो शायद

और कितने ही काम बाक़ी हैं
ज़ख्म धोने में देर हो शायद

वो दिलासा सभी को देता है
उसको रोने में देर हो शायद

मुझको दुनिया से भी निभानी है
तेरा होने में देर हो शायद

Wednesday, April 18, 2012

इश्क जो सीने में पनपे तो सूरत और निखरती है

हिम्मत को ग़र अक्ल मिले तो तख्तों पे जा चढ़ती है
हिम्मत हो या अक्ल हो लेकिन  हुस्न का पानी भरती है

मेरी ही अंदर की मुहब्बत बह गई शायद आँखों से
वर्ना चुपके-चुपके वो तो आज भी मुझपे मरती है

हम दिल की कर ही लेते हैं क़ुफ्र-ओ-सवाब के पर्दे में
और खुदा को ये लगता है दुनिया उस से डरती है

अच्छी शक्लों वाले सुन लें, जांचा परखा नुस्खा है
इश्क जो सीने में पनपे तो सूरत और निखरती है

अक्ल-ओ-हुनर भी होंगे लेकिन मेरे अब्बू कहते हैं
मेहनत करने वालों की तो क़िस्मत और संवरती है